एक पुराना रिश्ता

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फूलों की नाज़ुकी से अब कोई रिश्ता नहीं
काँटे भी मेरी उंगलियों को अब चुभते नहीं
खुश्बू भी मुझसे क़तराके गुज़र जाती है
मगर वो लम्हात
मेरे ज़ेहन को आज भी महकाते हैं
यूँ ही राह में, कॉलेज के किसी मोड़ पर
वह क्लास छूटने की किसी होड़ में
हाथ टकराकर मेरे हाथ से
उनकी किताबों का गिर जाना
वह नाराज़गी उनकी मेरी गुस्ताख़ियों पर
मेरा शर्म से पानी-सा बिखर जाना
हाथों में जमा होती किताबों की मसरूफियत
उनके शानों पे ज़ुल्फों का बिखर जाना
हाँ, मुझे याद है वह लम्हात इस पहर भी
किताब के पन्नों में किसी ताज़ा गुलाब की सूरत
उनकी सूरत पे वह शर्मो हया
वह इख़लास का पैक़र
कुछ ही लम्हों की होती थी
टकराव की रस्साकशी
फिर किताबें थामकर चल देना तेज़ी से
पलटकर, मुस्कुराकर कह देना.....कोई बात नहीं
महक रहे हैं उसी दिन से आज तलक
मेरे हाथ, मेरा दामन और सूरत मेरी
भले ही टूट गया है मेरा वह रिश्ता
जो कभी गुलाब के फूलों से था
जो हाथ में थमी किताबों से था।

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